जीवन परिचय

तीर्थ रक्षा शिरोमणी श्रमण रत्न ‘गिरनार गौरव’ दिगम्बर जैनाचार्य श्री 108 निर्मलसागर जी महाराज का परिचय

परम पूज्य ‘गिरनार गौरव’ दिगम्बर जैनाचार्य श्री 108 निर्मलसागर जी महाराज का परिचय
गृहस्थ नाम श्री रमेश चन्द्र जैन
माता पिता श्रीमती गोमा देवी एवं श्री बहोरेलाल जी (आयुर्वेद रत्न)
जाति क्षत्रिय शिरोमणि पद्‌मावती पौरवाल जैन
जन्म मार्गशीष् कृष्णा द्वितीय सन् 1946
जन्म स्थान ग्राम पहाड़ीपुर जिला एटा (उ.प्र.)
क्षुल्लक दीक्षा बैसाख शुक्ला चतुर्दशी सन् 1965, सिद्धक्षेत्र, गिरनार
दीक्षा गुरू आचार्य श्री 108 सीमंधर सागर जी महाराज
मुनि दीक्षा आषाढ़ शुक्ला पंचमी सन् 1967 आगरा, (उ.प्र.)
दीक्षा गुरु आचार्य श्री 108 विमलसागर जी महाराज
आचार्य पद 13 अप्रैल सन् 1973 को सांगोद (कोटा राजस्थान) में आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज ने अपना आचार्य पद प्रदान किया।
गिरनार रक्षा हेतु आचार्य श्री के 30 से भी ज्यादा चातुर्मास गिरनार में हो चुके है

निर्मल तपोमय व्यक्तित्व के साक्षात् दर्पण जागृतिकारी संत उपाध्याय श्री नयनसागर मुनिराज

परम पूज्य जागृतिकारी संत उपाध्याय श्री 108 नयनसागर जी मुनिराज का परिचय
पूर्व नाम संजय जैन
जन्म तिथि 24 मार्च 1972
पिता का नाम श्री सोनालाल जी जैन
माता का नाम श्रीमती मनोरमा देवी जैन
जन्म स्थान सोनगीरधुलिया (महाराष्ट्र)
गृह त्याग 28 सितम्बर 1987 (अहमदाबाद)
मुनि दीक्षा 30 दिसम्बर 1992 (एत्मादपुर, आगरा)
उपाध्याय पद 24 अप्रैल 1994 (एटा)
दीक्षा गुरु श्री 108 निर्मलसागर जी महाराज

त्याग, बलिदान और अध्यात्म की इस पावन धरती पर युगों-युगों से अनेकों संत विचरण करते आ रहे हैं जिन्होंने अन्धकार की कालरात्रिा में पूर्णिमा के चन्द्रमा की तरह उदय होकर अपने अध्यात्म, अहिंसा और अनुशासन का आलोक बिखेरा है। ऐसे ही विलक्षण और निर्मल, कोमल व्यक्तित्व के स्वामी परम पूज्य उपाध्याय श्री नयनसागर मुनिराज जन-जन के हृदय में परमात्मा के रूप में विराजमान हैं। 24 मार्च सन् 1972बीसवीं शताब्दी के आठवें दशक का प्रथम चरण, अन्धकार के वक्ष को चीरकर स्वर्ण रश्मियों ने जब इस धरा को छुआ तो महाराष्ट्र प्रान्त में स्थित सोनगीर (ध्ाूलिया) अनिर्वचनीय आभा से भर उठा जहॉं माता श्रीमती मनोरमादेवी की कुक्षि से, पिता श्री सोनालाल जी के आँगन में एक दिव्य प्रतिभा सम्पन्न बालक ने जन्म लिया। जिन्हें नाम मिला संजयकुमार। शस्य श्यामला धरती आभापूर्ण हो उठी। समग्र भारत की अपार कीर्ति में वृद्धि हुर्इ और ऐतिहासिक जगत् में सदा सर्वदा के लिए सम्मिलित होकर अमर हो गया यह दिन जिसने न केवल माता-पिता को अनुपम गौरव प्रदान किया अपितु पूरा भारत ही धन्य हो उठा।
बालक संजयकुमार का बचपन अनेक विलक्षणताओं का संगम रहा। बुद्धि इतनी तीक्ष्ण कि एक के बाद एक परीक्षा उत्तीर्ण करते गये और शीघ्र ही पड़ोसियों, सहपाठियों तथा शिक्षकों के बीच लोकप्रिय हो गये। सभी के दु:ख-दर्द में आगे रहते, स्कूल में इच्छित वस्तु प्रदान कर अपने सहपाठियों को अध्यापक के दंड से बचा लेते, भ्ाूखे को भोजन करा देते। संसार में व्याप्त बुरार्इ, असमानता और कष्टों को देख उनका हृदय विह्वल हो उठता तथा नित्य सुबह-सायं मन्दिर में जाकर भगवान से इन कष्टों से मुक्ति का रास्ता पूछते। जिनेन्द्र भगवान मुस्कराते हुए मानो कह रहे हों संजय ! तुम्हें भोगों से विरक्त होकर योग की ओर मुक्ति की राह पकड़नी है, तुम्हें आत्मकल्याण के साथ असीम मानवता को अध्यात्म कर्म का पाठ पढ़ाकर समष्टि कल्याण करना है, अपने आध्यात्मिक परिश्रम की बूँदों से मिट्टी को सींचकर अनेकों कल्पवृक्ष उत्पन्न करने हैं और शिवशंकर की तरह समाज में व्याप्त बुराइयों का विषपान कर अध्यात्म और सुख-समृद्धि का अमृृत प्रदान करना है।
संजय भीतर ही भीतर अनेकों अनुत्तरित प्रश्नों का समाधान खोजते रहते थे। जब कभी माता से संसार की निस्सारता के विषय में प्रश्न करते तो वह भीतर ही भीतर कॉंप उठती। कहीं पुत्रा संसार त्याग का मन न बना ले उसे और अधिक सुख-सुविधाएं देती। परन्तु संजय को देखने से ही प्रतीत होता यह कोर्इ ऐसी दिव्यात्मा है जो अपने पूर्व जन्म के शेष कार्य को पूर्ण करने के लिए ही इस धरा पर अवतरित हुर्इ है। किशोरावस्था सृजन का महकता गुलदस्ता बनकर बिखरी जब यौवन की दहलीज पर पॉंव रखने से पूर्व ही पीड़ित मानवता के उत्थान के दृढ़ संकल्प ने इन्हें मानवता का मसीहा बना दिया।
जिस प्रकार राख में दबे अँगारे एक फूँक मात्रा से पुन: दहक उठते हैं उसी प्रकार संजय के अन्त:करण में दबी वैराग्य की चिंगारी पर फूँक मारने का कार्य किया परमपूज्य आचार्य श्री निर्मलसागर महाराज ने जिनके मुख से नि:सृत बहुमूल्य शब्द रूपी मंत्रा ने ‘‘क्या आपको अपने आप पर विश्वास नहीं है तुम भी मुभ+ जैसे बन सकते हो’’ संजय के हृदय को झकझोर डाला और वैराग्य का सागर हिलोरें लेने लगा। उसी समय ‘‘नेमि राजुल’’ नाटक के प्रदर्शन से तो उनके हृदय में वैराग्य का सूर्य पूरी तेजस्विता के साथ उदय हो उठा और वे इतने भावविभोर हो गये कि सम्पूर्ण समाज के समक्ष सारे कपड़े उतार फेंक निर्वस्त्रा हो गये। माता-पिता हतप्रभ, आखिर क्या कमी थी संजय को? पिता का दुलार, मॉं की ममता, बहन भार्इ का स्नेह सुख वैभव सभी कुछ तो था। लेकिन जिसे लाखों करोड़ों बुझे दिलों का रोशन चिराग बनना था, जिसका अवतरण ही पीड़ित मानवता के उत्थान के लिए हुआ हो और जिसे पहले ही आखिरी सॉंस लेती, दम तोड़ती भारतीय संस्कृति ने अपने उत्थान के लिए बॉंध लिया हो वह भला सांसारिक मोहपाश में कैसे बँध पाता?
इसलिए 28 सितम्बर सन् 1987 को मात्रा 15 वर्ष की अल्पायु में वह अखण्ड ब्रह्मचर्य धारण कर समस्त सुख वैभव को ठोकर मारकर शूल कंकरों की परवाह किये बिना, तलवार की तेज धार पर नंगे पॉंव चल पड़ा मोक्ष पथ का पथिक मुक्ति पथ की ओर। मात्रा 25 दिनों में 500 कि.मी. की पदयात्राा की, आचार्य श्री निर्मलसागर जी महाराज के पावन चरणों में अहमदाबाद पहुँचे और कर दी गुरुवर से याचना क्षुल्लक दीक्षा की। आचार्य श्री हतप्रभ मात्रा 15 वर्ष की अल्पायु और दीक्षा परन्तु शीघ्र ही उनकी पारखी दृष्टि पहचान गर्इ कि उनके समक्ष कोर्इ अल्पायु किशोर बालक नहीं एक ऐसा दृढ़ संकल्पित महान योगी खड़ा है जो चन्दन की तरह महक कर समस्त विश्व को अपने अध्यात्म के मध्ाुर सौरभ से महकाकर रख देगा, मोमबत्ती की तरह अपने देह को नष्ट कर अन्धकार से अंतिम क्षण तक संघर्ष करते हुए विश्व को ज्योतिर्मय कर देगा, और निर्ग्रन्थ परम्परा में एक नया कीर्तिमान स्थापित कर नया इतिहास रचकर रख देगा। इसलिए आचार्य श्री ने अपना आशीष भरा हाथ संजय के सिर पर रख दिया और 6 मार्च सन् 1988 को संजय क्षुल्लक दीक्षा धारण कर परमपूज्य सुकौशलसागर महाराज कहलाए। समस्त गुजरात प्रान्त के इतिहास ने करवट ली और वहॉं के श्रेष्ठीजनों द्वारा इन्हें ‘बालरत्न’ की उपाधि से विभ्ाूषित किया गया।
वैराग्य के विभिन्न स्तरों से गुजरते हुए एत्मादपुर, आगरा में 30 दिसम्बर 1992 का वह दिन दिगम्बर परम्परा में स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया जब ज्ञान के अगाध सागर पूज्य श्री गिरनार गौरव आ. श्री निर्मलसागर जी महाराज जी ने आपको मुक्ति पद पर आसीन कर मुनि श्री नयनसागर जी महाराज के नाम से नामकरण किया तथा अभय संस्कृति को मिल गया एक स्तुत्य संरक्षक। तब से लगातार हजारों किलोमीटर की पदयात्राा करते हुए जन-जन के हृदय में अहिंसा की प्राण प्रतिष्ठा करते हुए, आध्यात्मिक पुनरुत्थान की प्रचण्ड गंगा प्रवाहित कर रहे हैं। पूूज्य श्री के द्वारा शाकाहार रथ प्रवर्तन तो इतना प्रभावी प्रमाणित हुआ कि भारत में ही नहीं बल्कि भारत की सीमाओं को लॉंघकर पूरे विश्व में गूँज उठा। विश्व के अनेकों देशों में बढ़ती शाकाहार प्रवृत्ति इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।
पूज्य श्री इसी प्रकार रत्नमय गंगा प्रवाहित करते हुए जन-मानस के हृदय में छाये विषाद रूपी अन्धकार को तिरोहित करते हुए सुख समृद्धि और शान्ति के पुष्प पल्लवित कर मुझे भी धर्म प्रभावना का शुभाशीष प्रदान करें। इन्हीं मंगल भावनाओं के साथ पूज्य श्री के चरणों में कोटिश: नमन।

प.पू. जागृतिकारी संत उपाध्याय 108 श्री नयनसागर जी मुनिराज की चातुर्मास सूची

  • सन् 1988    कुसुम्बा (धुलिया) महाराष्ट्र ऐलकावस्था
  • सन् 1989    सूरत गुजरात ऐलकावस्था
  • सन् 1990    केशरियाजी राजस्थान ऐलकावस्था
  • सन् 1991    छीपीटोला (आगरा) उत्तर प्रदेश ऐलकावस्था
  • सन् 1992    एत्मादपुर (आगरा) उत्तर प्रदेश ऐलकावस्था
  • सन् 1993    एटा उत्तर प्रदेश मुनि अवस्था में
  • सन् 1994    टूंडला (फिरोजाबाद) उत्तर प्रदेश उपाध्याय पद में
  • सन् 1995    फिरोजाबाद उत्तर प्रदेश उपाध्याय पद में
  • सन् 1996    अलीगढ़ उत्तर प्रदेश उपाध्याय पद में
  • सन् 1997    सिरसागंज (फिरोजाबाद) उत्तर प्रदेश उपाध्याय पद में
  • सन् 1998    द्यिरोर (मैनपुरी) उत्तर प्रदेश उपाध्याय पद में
  • सन् 1999    सिरसागंज उत्तर प्रदेश उपाध्याय पद में
  • सन् 2000    रघ्ाुवरपुरा (गांधी नगर) दिल्ली उपाध्याय पद में
  • सन् 2001    बड़ौत, बागपत उत्तर प्रदेश उपाध्याय पद में
  • सन् 2002    जैन बाग (सहारनपुर) उत्तर प्रदेश उपाध्याय पद में
  • सन् 2003    शामली (मु.नगर) उत्तर प्रदेश उपाध्याय पद में
  • सन् 2004    देहरादून उत्तरांचल उपाध्याय पद में
  • सन् 2005    शांति मौहल्ला दिल्ली उपाध्याय पद में
  • सन् 2006    सेक्टर-27 बी, चण्डीगढ़ चण्डीगढ़ उपाध्याय पद में
  • सन् 2007    वहलना अतिशय क्षेत्रा उत्तर प्रदेश उपाध्याय पद में
  • सन् 2008    मुनीम कॉलोनी, मु.नगर उ.प्र. उपाध्याय पद में
  • सन् 2009    यमुना विहार दिल्ली उपाध्याय पद में
  • सन् 2010    जैन नगर, सहारनपुर उ.प्र. उपाध्याय पद में
  • सन् 2011    ॠषभ विहार दिल्ली उपाध्याय पद में
  • सन् 2012    राधेपुरी, कृष्णा नगर दिल्ली उपाध्याय पद में
  • सन् 2013    वहलना, मु.नगर उ.प्र. उपाध्याय पद में
  • सन् 2014    खतौली, मु.नगर उ.प्र. उपाध्याय पद में
  • सन् 2015    सूर्यनगर, गाजियाबाद उ.प्र. उपाध्याय पद में
  • सन् 2016    भोलानाथनगर, दिल्ली दिल्ली उपाध्याय पद में

पूज्य उपाध्याय श्री 108 नयनसागर जी मुनिराज द्वारा साहित्य सृजन

पुष्प नं. 1 क्रोध से समझौता
पुष्प नं. 2 ते गुरु मेरे मन बसो
पुष्प नं. 3 जागृति के सूत्र
पुष्प नं. 4 गुरु भक्ति (भजन)
पुष्प नं. 5 मैं प्रवचन नहीं, प्रेरणा देता हूं
पुष्प नं. 6 मुझे भी आपसे कुछ कहना है।
पुष्प नं. 7 अब तक की ; (सर्वश्रेष्ठ प्रश्नोत्तरी)
पुष्प नं. 8 दुर्लभ क्षण (काव्य संग्रह)
पुष्प नं. 9 जैनत्व संस्कार
पुष्प नं. 10 दिसम्बर का दिगम्बर हिमालय में