गुरुतीर्थ निर्मलायतन


श्री दिगम्बर जैन गुरुतीर्थ निर्मलायतन


श्री दिगम्बर जैन गुरुतीर्थ ‘निर्मलायतन’, नानौता (उ.प्र.), दिल्ली—सहारनपुर राजमार्ग दिल्ली से १३५ कि.मी., सहारनपुर से ३३ कि.मी., अतिशय क्षेत्र वहलना से ५४ कि.मी., अतिशय क्षेत्र जलालाबाद से मात्र १२ कि.मी. की दूरी पर स्थित है| श्री गुरु तीर्थ ‘निर्मलायतन’ का निर्माण केवल मात्र पूज्य गुरुदेव गिरनार गौरव जैनाचार्य श्री निर्मलसागर जी की भावनाओं का बल प्रदान करने का माध्यम है| संपूर्ण आदेश उन्हीं के मान्य है| गुरुदेव ने गिरनार क्षेत्र की सुरक्षा में अपना संपूर्ण संयमी जीवन समर्पित कर दिया है भारत भर में अलग जगा दी है| ऐसा ही पावन लक्ष्य हमारा भी है कि उत्तर भारतीय जैन समाज तथा दिल्ली जैन समाज सहित तमाम उनके भक्तों द्वारा उन्हें मात्र केवल—उन्हें समर्पित है निर्मलायतन |
परम पूज्य गिरनार गौरव जैनाचार्य श्री १०८ निर्मलसागर जी महाराज ने मार्च २००९ में एक स्वप्न देखा कि वह अपने परम शिष्य जागृतिकारी संत उपाध्याय श्री १०८ नयनसागर जी के करकमलों से १००८ रत्नमयी जिनबिम्ब विराजमान करवा रहे हैं| बात जब उनके शिष्य नयनसागर जी तक पहुँची और उन्होंने अपने भक्तों तक यह बात पहुँचायी और तुरन्त अपने शिष्यों को आदेश दिया कि शीघ्र ही गिरनार जाओ और आचार्य श्री से इसे समझो| एक टीम तुरंत गिरनार गई, आचार्य श्री से जाना, समझा व आदेश के पालन का संकल्प लिया |
जून २००९ में भूमि का चयन हुआ, भूमि खरीद ली गई, जिसको नाम दिया गया है — श्री दिगम्बर जैन गुरु तीर्थ ‘निर्मलायतन’| जो दिल्ली सहारनपुर राजमार्ग पर १३५ कि.मी. के माइल स्टोन के संकेत स्थान पर उपलब्ध है| पूज्य उपाध्याय श्री का निर्णय एक तरफा था कि क्षेत्र का नाम पूज्य गुरुदेव के नाम पर ही होगा| नाम भी उपाध्याय श्री ने ही सूझाया और निश्चित भी किया| संस्था का नाम रखा गया नयन जागृति संस्थान (रजि.), नानौता, सहारनपुर, उ.प्र.|
२३ नवम्बर २००९ को निर्मलायतन में बाउन्ड्री वॉल का कार्य प्रारंभ हुआ| १५ माह में १५००० गज से अधिक भूमि का यह प्रथम कार्य पूर्ण हुआ| सन् २०११ के मार्च माह में वहॉं उपाध्याय श्री का २४ मार्च को ३९वॉं वात्सल्य दिवस भी मनाया गया| तत्पश्चात् मिट्टी की भराई का कार्य प्रारम्भ हुआ १८५ फीट का विशाल फ्रंट तथा ७८० फीट की लम्बाई युक्त इस भूमि को अनुमानित ९ लाख क्यूबिक मिट्टी भरकर लगभग ६ फीट ऊंचा उठाया गया| एक भव्य मनोहर प्रस्तावित प्रारुप बनाया गया|
पूज्य उपाध्याय श्री के दो इष्ट आराध्य है एक नवम् तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत जी और एक जीवन उद्धारक संयम प्रदाता गुरुवर आचार्य श्री निर्मलसागर जी महाराज| गुरुदेव के नाम से क्षेत्र का नाम रखा तो अपने प्रथम आराध्य श्री पुष्पदंत भगवान की विश्व की प्रथम खड्गासन २७ फीट ऊंची प्रतिमा तथा ४ फीट ऊंचे कमल आसन पर विराजमान करने का निश्चय किया| इस तरह कुल ३१ फीट ऊंची यह प्रतिमा बनवाने का संकल्प लिया |
प्रथम चरण में तीर्थंकर पुष्पदंत निलय एवं श्री निर्मलसागर निलय का निर्माण कार्य प्रारंभ है| २७ फीट प्रतिमा एवं कमल का पाषाण निर्माण हेतु तीर्थ पर पहुँच चुका है| एक कलश मंदिर जो कि मात्र पाषाण से निर्मित होगा अद्वितीय होगा, प्रथम कलश मंदिर भी होगा| द्वितीय चरण में मुख्य द्वार एवं नयनसागर निलय तथा चिकित्सालय का निर्माण किया जायेगा| तीसरे चरण में बनेगा चैत्यवृक्ष मंदिर जिसमें १००८ रत्नमयी जिनबिम्ब विराजमान होंगे| ४०० गज युक्त भूमि में एक—एक सुंदर भवनों का निर्माण होगा |

निर्मलायतन तीर्थ की मुख्य योजनाएँ

  1. १.   तीर्थंकर पुष्पदंत निलय — (२४ कक्ष)
  2. २.   श्री निर्मलसागर निलय — (६ हॉल)
  3. ३.   उपाध्याय नयनसागर निलय — (संत भवन)
  4. ४.   २७ फीट उत्तुंग भगवान पुष्पदंत प्रतिमा — (आरक्षित)
  5. ५.   कलश मंदिर का निर्माण — (आरक्षित)
  6. ६.   चैत्यवृक्ष का निर्माण — (५१ हजार प्रति जिनबिम्ब)
  7. ७.   परोपकार योजना (चिकित्सा एवं सेवा)
  8. ८.   श्रुतस्कंध शास्त्र मंदिर एवं गुरु चरण तीर्थ स्थापना
  9. ९.   शिक्षार्थी अभ्युत्थान योजना (उच्चतम शिक्षा योजना)


भारतवर्ष का प्रथम १००८ रत्नमयी जिनबिम्बों से निर्मित होगा चैत्यवृक्ष जिसमें आप भी अपने परिवार की ओर से प्रति जिनबिम्ब मात्र ५१,००० रुपये में विराजमान कर पुण्यार्जन करें